संस्कार
पढ़ना और पढ़ाना मेरा शौक ही नहीं बल्कि मेरा जुनून है इसीलिए मैंने शिक्षकीय पेशे का चुनाव किया। बच्चे सिर्फ मुझसे ही नहीं सीखते बल्कि मैं भी उनसे बहुत कुछ सीखती हूँ ।एक कक्षा में चालीस बच्चे जिसमें मुख्य रूप से चालीस अलग-अलग स्वभाव के बच्चों को अलग-अलग तरीके से संभालना- समझना, सही राह दिखाना यही मेरा उद्देश्य था । हर वर्ष कुछ ऐसे बच्चों से सामना होता था जो बहुत उद्दंड और अशिष्ट होते थे। जिनका पढ़ाई - लिखाई से दूर-दूर तक संबंध नहीं होता था। वह तो स्कूल माता - पिता के कहने पर आ जाते थे। स्कूल तो माध्यम होता था उनके शरारतों को अंजाम देने का।
कक्षा अध्यापक के रूप में कुछ उदंड बच्चों से सामना मेरा दसवीं सी की कक्षा में हुआ। न उनमें शिष्टाचार था ,न बात करने की तमीज। कक्षा काङङङङङङङङङङ माहौल बदलता जा रहा था और समय रेत की तरह फिसलता जा रहा था। मैं हर दिन उन्हे नैतिक मूल्यों की कहानियाँ सुनाकर,डाट -फटकार कर समझाने -सिखाने का प्रयास करती परंतु बहुत समझाने पर भी जब बच्चों में बदलाव नहीं आ रहा था तब मैंने कुछ बच्चों के अभिभावकों को बुलाकर बात किया । इसका असर कुछ बच्चों पर तो हुआ , परंतु एक बच्चे पर कोई असर नहीं हुआ । वह मुझसे भी बहुत ही उदंडता से बात करता था। शिक्षकों का सम्मान तो उसके अंदर था ही नहीं । मैंने धीरे-धीरे उसकी और ध्यान देना छोड़ दिया था , तत्पश्चात पीटीएम में उसके पिताजी आए साथ में बच्चा भी था। मुझसे पूछने लगे मैम अभी संस्कार कैसा है पढ़ाई में?
मैंने कहा सर रिजल्ट आपके सामने है आप देख सकते हैं आपको पता चल ही जाएगा कि कितना पढ़ता है ।
मैम कक्षा में व्यवहार कैसा है?
सर मुझे यहाँ पढ़ाने के पैसे मिलते हैं अपनी बेइज्जती कराने के नहीं। मैने अब इसे बोलना छोड़ दिया है।
उसके पिता की आंखें नम थी ।
मैम आप ऐसा बोलेंगी तो कैसे पढ़ेगा ?
यह घर में अपनी माँ से भी इसी तरह बात करता है। करता होगा सर , परंतु मैं इसकी माँ नहीं हूँ जो हर दिन अपमान सहन करूँ।
मेरी बातों का जवाब नहीं था उनके पास...।
कुछ देर चुपचाप बैठे बाप - बेटे उत्तर पुस्तिका के पन्ने पलटते रहे और मैं दूसरे अभिभावकों से बात करने लगी। कुछ देर बाद उसके पिताजी ने कहा ठीक है मैम, मैं चलता हूँ ,परंतु आप थोड़ा ध्यान दीजिएगा संस्कार पर।
कहते हुए उनकी आंखें नम थी और दोनों हाथ जुड गए थे ।
यह कहने की जरूरत नहीं है हमारे लिए सभी बच्चे समान हैं । बच्चों की शरारत बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन किसी भी शिक्षक का एवं अपना अपमान नहीं सहन कर सकती सर, हमारा भी आत्मसम्मान है। इसका तो सिर्फ नाम ही संस्कार है, संस्कार तो इसके अंदर है ही नहीं। वह अपने बच्चे के साथ नम आंखों से विदा हो गए, परंतु मैं परेशान हो गई ।
मुझे उनसे इस तरह बात नहीं करना चाहिए था ।मैं शिक्षक हूँ, हर बच्चे को सही राह दिखाना मेरी जिम्मेदारी है और शायद मैंने जो भी कहा था वह बच्चे को सुधारने के उद्देश्य से ही कहा था।
उस मुलाकात के बाद से संस्कार की जिंदगी का नया अध्याय आरंभ हुआ। पहले तो उसने अपने व्यवहार में बदलाव किया तत्पश्चात कक्षा में पढ़ाई में ध्यान देना लगा तो शरारत से ध्यान खुद-ब-खुद हट गया। शिक्षकों के प्रति भी उसका रवैया बदल गया था।अब सभी शिक्षकों से शिष्टता से बात करने लगा था। मैं कहीं भी रहूँ चाहे उसे कितना भी अनदेखा कर आगे बढ़ जाऊँ वह सामने से आकर अभिवादन अवश्य करता । मैंने नोटिस किया कि मेरे अनदेखा करने से वह सुधर रहा है तो मैंने उसे अनदेखा करना जारी रखा।दो महिने पश्चात प्री बोर्ड की परीक्षा में उम्मीद से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया, तब मैंने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा- तुम्हारी उत्तर पुस्तिका देखकर मुझे लग रहा है कि तुम आजकल पढ़ाई में ध्यान देने लगे हो ,सिर्फ मेरे विषय में ही नहीं बल्कि सभी शिक्षक बोल रहे थे। कुछ देर तक तो संस्कार मुझे ऐसे देख रहा था जैसे उसे मेरी बात पर यकीन ही नहीं था । फिर मुस्कुराहट के साथ मुझसे कहा - थैंक यू मैम।
प्री बोर्ड के पश्चात परीक्षा अवकाश शुरू हो गया था। इस बीच उसने मुझे एक दिन मैसेज किया- मैम मैं आपको पास होकर दिखाऊँगा , सिर्फ पास ही नहीं बल्कि अच्छे नंबर से पास होकर दिखाऊँगा ।मैं उसे रिप्लाई देने के बारे में सोचती रही लेकिन रिप्लाई नहीं दे पायी । जिस दिन बोर्ड की परीक्षा थी उस दिन आकर मेरा चरण स्पर्श किया और बोला- मैम मुझे आपके आशीर्वाद की सबसे ज्यादा जरूरत है । मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ था , है और रहेगा बेटा ।
जब परीक्षा परिणाम आया तो मैं उसका परिणाम देखकर खुश थी क्योंकि शुरू में उसके जो हालात थे उस हिसाब से बहुत अच्छे नंबर आए थे। अब मैं उसे नंबर से नहीं बल्कि उसे व्यक्तित्व से आंकना प्रारंभ कर दी थी । नंबर तो वैसे भी एक गिनती है ।जब रिजल्ट निकलता है तभी लोग नंबर पूछेते हैं ।बाद में वह नंबर नहीं बल्कि बच्चों का व्यक्तित्व ही काम आता है । मेरी नजर में अब वह एक शिष्ट और संस्कारी छात्र था । मैं हमेशा अपने बच्चों को यही सिखाती हूँ कि परीक्षा के नंबर जब परिणाम आता है तभी आपको पहचान दिलाते हैं लेकिन आपका व्यक्तित्व आपको सभी जगह पूरी जिंदगी सम्मान दिलाता है, इसलिए पहले अच्छे इंसान बनो यदि इंसान बन गए तो पढ़ाई तो अपने आप कर ही लोगे।
विद्यालय खुलने पर मैंने उससे पूछा रिजल्ट कैसा आया, तुमने मुझे बताया नहीं?
मैम वह नंबर थोड़े कम थे इसलिए नहीं बताया आपको ।
नंबर कम नहीं आया है बेटा; जितना आया है बहुत अच्छा आया है।
लेकिन मैं शुरू से पढ़ा होता तो और अच्छे नंबर आते।
हाँ यह तुम्हें महसूस हो रहा होगा लेकिन मैं तो खुश हूँ कि अब तुम पढ़ने लगे हो।
थैंक यू मैम , अब मन लगाकर पढ़ूँगा ।
11वीं में भी मैं उसे पढ़ा रही थी । अब वह पहले जैसा उदंड नहीं था ।उसमें वह सारे गुण थे जो एक शिष्ट छात्र में होते हैं ।सभी शिक्षकों से सम्मान के साथ बात करने लगा था ।
बिगड़े हुए बच्चे को सुधरते देखकर मुझे महसूस होता है कि मेरा शिक्षक होना सार्थक हो गया, परंतु मुझे सबसे अधिक आश्चर्य तो उस दिन हुआ जब मैने गृहकार्य में 11वीं के बच्चों को अपने प्रिय शिक्षक पर अपने विचार लिखने को कहा था और उसने मेरे लिए लिखा था -"मेरे विचार से आप एक अच्छी शिक्षिका हैं, क्योंकि आप दंड उसी को देती हैं जिसकी गलती होती है ।आप सभी बच्चों को समान प्यार करती हैं तथा पढ़ाई के साथ-साथ जीवन जीने की भी सीख देती हैं । जब मैं आपकी कक्षा में था तब मैं आपकी बात नहीं मानता था तब मुझे ऐसा लगता था कि आप मुझे समझ नहीं पाती हैं, लेकिन अब मैं एक अच्छा छात्र हूँ और मुझे अच्छा छात्र बनाने में आपका ही हाथ है। आप एक शानदार शिक्षक हैं; जो अपने कार्य के प्रति सदैव जागरूक और अनुशासित रहती हैं ।" उपर्युक्त कथन पढ़कर मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही लड़का है जो बात- बात पर मुझसे उलझ जाता था । कभी मेरी बात मानने को तैयार नहीं होता था ।हमेशा दस बहाने बनाकर बहस करता था । आज वह इतनी अच्छी बातें मेरे बारे मे लिखा है ।
खैर जो भी हो मेरा उद्देश्य तो पूरा हुआ जिसका परिणाम हमारे सामने था।
एक वर्ष के बाद पीटीएम में अपनी मम्मी को मिलवाने मेरे पास लेकर आया। मैम ये मेरी मम्मी हैं। उनके दोनों हाथ जुड गए। मैम संस्कार कैसा है ?
अब इसके बारे में कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है अब यह संस्कार सचमुच में संस्कारी बन गया है।
क्यों संस्कार यह बात तुम भी मानते हो न?
जी मैम; वह आपके कारण ।
फिर उसकी मम्मी ने कहा - मैम पढ़ाई में भी ध्यान देने लगा है ।यह सब आपके कारण ही संभव हो सका ।
मैंने संस्कार से कहा - "जानते हो बेटा, मुझे अनेक सम्मान मिला है, लेकिन तुमने जो आज सम्मान दिया है वह उन सबसे बढ़कर है । तुम अच्छे से पढ़ो - लिखो, आगे बढ़ो और मुझे क्या चाहिए।"
माँ- बेटे मुझसे विदा होकर चले गए और मैं मन ही मन खुशी से आप्लावित हो रही थी और एक वर्ष पूर्व उसके पापा की नम आंखों को याद कर रही थी कि उस समय अपने बच्चे के व्यवहार के कारण वह मेरे समक्ष कितने निरीह और विवश थे और आज उसी बच्चे के कारण माँ का सिर गर्व से ऊँचा हो गया था।
समय का पहिया घूम रहा था। मैं स्कूल छोड़कर कॉलेज में आ गयी। व्यस्तताओं के बीच भी स्मृतियों में कहीं न कहीं संस्कार था ।तीन साल बाद उसी संस्कार का मेरे पास फोन आया और कहने लगा मैम आप कहाँ हैं ? मैं आपसे मिलना चाहता हूँ ।
मैंने उससे कहा - मिलना चाहते हो तो घर में या फिर कॉलेज में आ जाओ।
वह मिलने के लिए मेरे कॉलेज आया । चरण स्पर्श किया और बहुत उत्साहित होकर बताया मैम मेरा एमबीबीएस में सिलेक्शन हो गया है । मैं फर्स्ट ईयर का छात्र हूँ ।उसे अपने सामने देखकर मैं जिस खुशी को महसूस कर रही थी उसे मैं शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकती हूँ । इतना ही नहीं वह अपने साथ अपना अप्रेन लेकर आया था और मुझे दिखाते हुआ बोला -मैम,मैं इसे पहनकर आप के साथ फोटो लूँगा । वो मेरे साथ फोटे लेने के बाद बहुत खुश था ।मैं सोच रही थी कि10th क्लास में उसकी जो स्थिति थी कभी कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह बच्चा कभी एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा ,लेकिन आज जो बच्चा एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है वह एक संस्कारी छात्र संस्कार मेरे सामने था ,जिसे देखकर मैं गौरवान्वित थी और वह मेरे समक्ष नतमस्तक था कि मैं आपके कारण आज यहॉं तक पहुँचा हूँ । मैंने कहा - मैं नहीं , वो ऊपर वाला किसी को माध्यम जरूर बनाता है , बस मैं माध्यम हूँ । वह मेरे चरणों में झुक गया ।संस्कार सच में तुम अब संस्कारी बन गए हो।
मैम; आपका आशीर्वाद सदैव बना रहे ।
मैने कहा- मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है बेटा।
डॉ.अनिता सिंह
समीक्षक/उपन्यासकार
बिलासपुर (छ.ग. )
12/02/2025
बुधवार, 31 दिसंबर 2025
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
लॉकडाउन
लॉकडाउन
14 मार्च 2020 को मैं प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुई और 22 मार्च 2020 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने संपूर्ण लॉकडाउन घोषित कर दिया ।कोरोना के कारण यह अजीब सी मुसीबत आ गयी थी। घर के चहारदीवारी में सब कैद हो गए। कहाँ में उत्साह से लरबेज थी कि पंद्रह दिन में यहाँ का काम समेट कर एक अप्रैल तक भाई के पास चली जाऊँगी , लेकिन लॉक डाउन के बाद तो ऐसा लगने लगा था कि समय ठहर सा गया है। इधर-उधर के बहुत सारे कार्य करती, पढ़ती- लिखती; फिर भी समय व्यतीत नहीं हो रहा था, या यूँ कह लीजिए कि पिछले 35 वर्षों से जो कॉलेज जाने की दिनचर्या थी उसे भूल नहीं पा रही थी । अकेलेपन से ऊब कर थोड़ा सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गई ।अब हर दिन कुछ नया लिखना पोस्ट करना और लोगों द्वारा लाइक करना, कमेंट करना अच्छा लगने लगा था। मेरा ज्यादा समय अब सोशल मीडिया पर व्यतीत हो जाता था। पता ही नहीं चलता था समय का।परिवार,,सहेलियाँ ,रिश्तेदारों की खबर सब कुछ देख, पढ़कर अच्छा लगता था । किसी का जन्मदिन तो किसी की शादी की सालगिरह सबको आशीर्वाद, बधाई देकर असीम लगाव महसूस कर रही थी । जाने पहचाने के साथ-साथ कुछ अनजाने लोगों से भी जुड़ने लगी। बहुत कुछ नया पढ़ने, देखने लगी। एक दिन किसी की प्रोफाइल फोटो में बहुत ही खूबसूरत पेंटिंग लगी थी, मेरी पसंदीदा गुलाबी फूल।उन फूलों को देख कर मन वहीं ठहर सा गया। उस कलाकृति को बहुत देर तक निहारती रही । बहुत सुकून और असीम शांति महसूस कर रही थी उसे देखकर ।तत्पश्चात मैंने उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया तथा उसने भी मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार कर लिया ।मैंने उसकी पेटिंग के लिए दो पंक्तियाँ लिख दी ।
मैंने जब उसकी प्रोफाइल देखी तो पता चला वह रिटायर्ड सर्जन हैं। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ सर्जन और इतनी खूबसूरत पेंटिंग ।मैंने उनके बारे में नेट पर सर्च किया तो पता चला कि वह अमेरिका से रिटायर्ड होने के पश्चात भारत आकर केरल के किसी चैरिटी अस्पताल में निःशुल्क सेवा दे रहे हैं ।मेरा मन उनके बारे में सोचने पर विवश हो गया। पेंटिंग देख कर ही समझ में आ रहा था कि इनमें मानवता कूट- कूट कर भरी है ।अब हर दो दिन में एक नई पेंटिंग देखने को मिलने लगी। एक दिन उन्होंने अपनी प्रोफाइल अपडेट की तो उस पेंटिंग के नीचे फोन नंबर भी लिखा था। मैंने नंबर मोबाइल में सेव किया तो डीपी में भी वही खूबसूरत गुलाबी फूलों वाली पेंटिंग लगी थी ।मैंने हाय लिख कर मैसेज भेज दिया ।उसने भी रिप्लाई किया --हू आर यू?
मैंने अपना पूरा परिचय दिया तो उसने रिप्लाई किया आपको कैसे भूल सकता हूँ आप हमारी पेंटिंग के लिए कमेंट के रूप में अच्छी- अच्छी पंक्तियाँ लिखती हैं जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि मेरी पेंटिंग पूरी हो गई नहीं तो अधूरी थी ।
जी धन्यवाद....।
अब मुझे एक नया काम मिल गया था हर दो दिन में एक नई पेंटिंग आती और मैं उस पर चार पंक्तियाँ लिखकर मैसेज भी कर देती । एक दिन बहुत ही सुंदर पेंटिंग थी । खिला-खिला सा आसमा समुद्र का किनारा , किनारे पर समुद्र की लहरों को निहारता हुआ एक अकेला आदमी बैठा था । मैंने उस पेंटिंग के लिए लिखा---
अकेले बैठे देखकर
लहरें यह कह रही हैं
तू अकेला नहीं है
मैं भी तेरे साथ हूँ
जरा हाथ तो दो
मैं भी तुम्हें थाम लूँ।
उस पेंटिंग को देखकर मुझे मेरी जिंदगी का अकेलापन याद आ गया था। पापा की अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु के के बाद माँ की बीमारी , छोटे भाई की जिम्मेदारी संभालते- संभालते शादी की उम्र कब निकल गई पता ही नहीं चला । जिम्मेदारियाँ भी इतनी थी कि शादी का कभी ख्याल भी नहीं आया। नौकरी और घर के बीच ऐसी उलझी की प्यार- मोहब्बत की तरफ ध्यान ही नहीं गया। माँ के जाने के बाद मैंने अपने बारे में सोचना शुरू किया तो कोई मन का मिला भी नहीं ।
मैसेज पढ़कर उधर से रिप्लाई आया बहुत अच्छा लिखती हैं आप । पंक्तियाँ पढ़कर मैं तो बेहोश होते- होते बचा ।
मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं लिखा था....... मैंने तो ऐसे ही अपना अकेलापन याद कर लिख दिया था मन के भावों को ।
अरे इस उम्र में तो कोई भी पढ़ कर बेहोश हो जाएगा ।
ऐसे डॉक्टर साहब..... आपकी उम्र क्या है?
मैडम जी मुझे रिटायर्ड होकर दस वर्ष हो चुके हैं ।
वैसे आपकी उम्र क्या है?
क्या आपको पता है - औरत से उसकी उम्र और आदमी से उसकी आमदनी नहीं पूछनी चाहिए?
मुझे पूछना तो नहीं चाहिए फिर भी ....।
अरे! ऐसी कोई बात नहीं है। हम चाहे कितना भी छुपा लें, पर उम्र अपनी उपस्थिति तो दर्ज करा ही देती है। वैसे अभी मैं इसी महीने 14 मार्च को 2021 को कॉलेज से प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुई हूँ।
अच्छा, तो आप भी डॉक्टर हैं....... ।
जी ,पर सर्जन नहीं हूँ....।
मैसेज से कब फोन पर घंटों बात करने लगे पता ही नहीं चला कि एक दूसरे के पेंटिंग और लेखन की प्रशंसा करते- करते महीनों निकल गए ।अब मुझे लॉकडाउन और अकेलापन नहीं बल्कि उनसे बात करने की बेचैनी सताने लगी ।
कभी-कभी मुझे हिचकिचाहट भी होती थी रोज क्या बात करना है और अपने आप से संकल्प भी करती कि आज बात नहीं करूँगी तभी कोई बहुत सुंदर पेंटिंग भेज देते तो मैं फोन करने से अपने आप को रोक नहीं पाती और उनसे कहती कि आप इतनी खूबसूरत पेंटिंग बनाते हैं कि मैं प्रशंसा किए बिना रह नहीं पाती हूँ।
कोई बात नहीं ...., इसमें इतनी सोचने वाली बात क्या है ?मैं ठहरा रिटायर व्यक्ति मेरे पास समय ही समय है आप जब चाहे फोन कर सकती हैं। जी मैं भी रिटायर्ड हूँ तभी तो समय दे पाती हूँ अपने लेखन और आपको भी।
उन्होंने हंसते हुए कहा जब दोनों रिटायर्ड हैं तो तो सोचने की कोई बात नहीं है समय ही समय है हमारे पास जब मन करे तब बात कर लेंगे क्यों कैसी लगी मेरी बात .. . ?
जी बात तो ठीक कह रहे हैं आप ....फिर भी हर दिन बात करना आवश्यक तो नहीं है न ?क्या है न अब जिस दिन बात नहीं होती बड़ा खालीपन महसूस होता है ।वैसे भी हम एक दूसरे के कला के प्रशंसक है इसलिए बात करते हैं आपको मेरी कला पसंद आती है और मुझे आपकी । इसी बहाने मुझे कुछ अच्छा पढ़ने को भी मिल जाता है ।
फिर भी डॉक्टर साहब हर दिन बात करना क्यों आवश्यक हो गया है ?
क्यों आपको मुझसे बात करना अच्छा नहीं लगता .....?
अच्छा लगता है तभी तो इतना सोचती हूँ।
देखिए हमारा प्रेमी - प्रेमिका वाला रिश्ता तो है नहीं ,हम अच्छे दोस्त हैं इसलिए बातें करते हैं। मुझे नहीं लगता कि बात करने में कोई बुराई है । यदि आप बात नहीं करना चाहती हैं तो कोई बात नहीं परंतु मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं है ।
अरे ! नहीं-- नहीं... ऐसी कोई बात नहीं है ।मुझे भी अच्छा लगता है आपसे बात करना ।
तब फिर इतना क्यों सोचती हैं...?
जब मन करे बात कर सकती हैं ।मुझे भी अच्छा लगता है आपसे बात करना ,मैं भी आपके फोन का इंतजार करता हूँ ।
उनकी बातों से मुझे तसल्ली तो मिलती लेकिन मैं संतुष्ट नहीं थी। मैं खुद नहीं समझ पा रही थी कि मुझे क्या करना चाहिए । मुझे किस चीज की तलाश है ? कभी-कभी सोचती आज बात नहीं करूँगी लेकिन अपने आप को रोक नहीं पाती । दिन भर तो किसी तरह व्यतीत कर लेती लेकिन रात होते-होते मैं फोन कर ही लेती और यदि मैं एक दिन फोन ना करूँ तो दूसरे दिन शाम तक उनका फोन आ जाता ।
नमस्ते जी...। क्या बात है दो दिन से न फोन न मैसेज न कोई बात.....?
वैसी कोई बात नहीं है डॉक्टर साहब.... बस तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी इसलिए ....
अब कैसी है तबीयत .....।
जी पहले से ठीक हूँ । उनका इतनी आत्मीयता और मासूमियत से पूछना मुझे अंदर तक आह्लादित कर देता ।डॉक्टर तो वो थे ही ,क्या हुआ ?क्या प्रॉब्लम है ? मैं दवा का नाम मैसेज कर देता हूँ ले लीजिएगा ।फिर दूसरे दिन भी फोन करके तबीयत के बारे में पूछ लेते।
उम्मीद करता हूँ आप पहले से ठीक होंगी ।
जी अब पहले से ठीक हूँ।
बस आप को फोन करके परेशान करती रहती हूँ ।
इसमें परेशानी की क्या बात है बल्कि मुझे खुशी है कि मुझे ऑनलाइन भी एक पेसेंट मिल गई है एक डॉक्टर को और क्या चाहिए । बात करते रहिए , दवा लेते रहिए जल्द ही ठीक हो जाएंगी ।
अब तो आप से बात करने की आदत हो गई है जिस दिन बात नहीं करती हूँ बहुत अधूरा- अधूरा सा लगता है ।
मुझे भी ऐसा ही लगता है । सेम हीयर.....।
आप मुझसे बात क्यों करते हैं ?
क्योंकि आप दिल की बहुत साफ हैं, बहुत नेक दिल हैं और ऐसे लोग मेरे दिल के बहुत करीब होते हैं उनमें से एक आप भी हैं ।
थैंक यू .....।
आप मेरे दिल के बहुत करीब है, इंग्लिश में एक शब्द है न... डार्लिंग.... बस इससे ज्यादा मैं नहीं बता सकता हूँ। ओके .. टाटा.. बाय -बाय ..कहकर फोन रख दिए ।
मैं खुशी से झूम उठी। कोई इस उम्र में भी ऐसी बातें करता है क्या ?वह भी एक ऐसी औरत से जिससे कभी किसी ने इस तरह की बात नहीं की थी । उनकी बात सुनकर मैं अंदर तक सिहर गई ।अब उनके मैसेज और फोन का हर वक्त इंतजार रहता तथा उनके लिए बेचैन रहने लगी पता नहीं कैसे भूख, -प्यास ,नींद सब गायब ।जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा था वह सब मेरी समझ से परे था ।ऐसी बातें में किताबों में पढ़ी थी और कहानियों में लिखती भी थी लेकिन इस तरह की बेचैनी किसी के लिए मैं पहली बार महसूस कर रही थी । मैं सोचती क्या सच में मुझे उनसे प्यार हो गया है .......? तत्पश्चात मन खुद से ही तर्क- वितर्क करता नहीं, नहीं, इस उम्र में ऐसा नहीं हो सकता। हम दोनों उम्र के इस पड़ाव पर हैं जहाँ न कुछ पाने की चाहत है न कुछ खोने की। एक दिन बेचैनी में मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी-----
ना तुझे खोना चाहती हूँ
न तुझे पाने की ख्वाहिश है।
बस तेरी खूबसूरत यादों को
दिल में सजोने की ख्वाहिश है।
हूँ मैं बेचैन जितना तेरे लिए
तुझे भी बेचैन करने की ख्वाहिश है ।
दिल का हर राज तुझे बताकर
तेरे दिल में ठौर पाने की ख्वाहिश है ।
तेरे रंग में रंगकर, झूमू ,नाचूँ,गाऊँ
तुझे अपने रंग में डूबोने की ख्वाहिश है ।
अपनी सारी हसरतों को तेरे रस में घोलकर
जाम तेरे नाम पी जाने की ख्वाहिश है।
जी सकूँ जिंदगी के रंग कुछ पल तेरे साथ
आज बेखूदी में डूब जाने की ख्वाहिश है ।
तुझ पर कोई नयी नज्म लिखकर
तेरे साथ गुनगुनाने की ख्वाहिश है ।
तत्पश्चात उनको पोस्ट कर दिया ।
उनका रिप्लाई आया बहुत अच्छा लिखती हैं आप । मैंने फोन किया तो कहने लगे -- मुझे लगता है अब आप आई लव यू बोल सकती हैं इसे बोलने में कोई बुराई नहीं है सुन रही है न........।
मैं निरूत्तर, नि:स्पंद,नि:शब्द होकर सुन रही थी।
यह खामोशी कैसी ?
जी......।
कुछ तो बोलिए .......।
आपको और समय चाहिए ,ले लीजिए ,लेकिन खुश रहिए। मैं आपको खुश देखना चाहता हूँ। ओके; आप ठीक है ना ......?
जी .....।
ओके, टाटा.... बाय.....।
उन्होंने दूसरे दिन एक मैसेज भेजा जिसमें लिखा था "शब्दों की ताकत को कम मत आकिएँ साहब क्योंकि छोटी सी हाँ और छोटी सी ना पूरी जिंदगी बदल देता है"। मैसेज पढ़ कर रिप्लाई कर दिया "हाँ" ।फिर भी पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लग रहा था। मन बहुत उदास था। अजीब सी बेचैनी में गुमसुम रहने लगी । ऐसा लगता कि मैं भीतर से टूटती बिखरती जा रही हूँ। अपने आप को बहुत समेटने की कोशिश करती लेकिन समझ नहीं पा रही थी ।अब हर दिन हम फोन कर घंटों बातें करते; मुझे बहुत समझाते बात करने में कोई बुराई नहीं है और यदि आप बिना बात किए खुश रह सकती हैं तो बात मत करिए और यदि बात करके खुश रहती हो तो खुश रहिए ।
न तो उन्होंने कभी खुलकर कहा तुमसे प्यार करते हैं न मैंने ही कभी अपना प्यार जाहिर किया, लेकिन दोनों एक दूसरे के मन के भाव को पढ़ते ,समझते , महसूसते ,अनकहे, अंजाने से स्नेह की डोर में मजबूती से बंधते जा रहे थे । कभी-कभी मैं अपनी बेचैनियाँ उनसे कहती तो यही कहते कि जितना आप बेचैन होती है उतना तो मैं नहीं होता । शायद उम्र का असर है लेकिन मैं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ और उसे स्वीकार भी करता हूँ।
उनका इस तरह से बातें करना मुझे और भी बेचैन कर देता ।जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा था और जिन अनुभूतियों से मैं गुजर रही थी सब कुछ मेरी समझ से परे थे ।अब मैं यह महसूस करने लगी थी कि मैं उन्हें बहुत चाहने लगी हूँ । हर समय उनका ख्याल, उनकी बातें मुझे रोमांचित और आह्लादित करती और मैं मन ही मन गुनगुनाती--
दर्पण मुझे अब भाने लगा है ।
मेरी रूह में तु मुस्कुराने लगा है ।
दर्शन ,अध्यात्म,राम ,कृष्ण,गुरुनानक ,बुद्ध, साहित्य ,इतिहास जाने कहाँ -कहाँ की कितनी बातें करते रहते और मैं उन्हें खामोशी से सुनते हुए वह जो नहीं कहते उसे भी सुनने की कोशिश करती । मेरी खामोशी को तोड़ने के लिए बीच-बीच में मजेदार चुटकुले सुनाते फिर हम खिलाकर हंस देते ।हमलोगों को बात करते हुए लगभग सात महीने हो गए थे। एक दिन उन्होने हमसे कहा - यू लव मी
मैंने कहा हाँ...
आप मुझसे प्यार करती हैं?
हाँ ....
बट 'आई लाइक यू' और यही सच है। मैं आपको पसंद करता हूँ ,पसंद नहीं खूब पसंद करता हूँ। उसके आगे स्टार और फाइव स्टार भी लगा दीजिए और कुछ नहीं कहना यही सच है । जितनी जल्दी आप इस बात को समझ जाएंगी उतना ही हम दोनों के लिए अच्छा रहेगा ।
मैंने भी नम आंखों और रूधे गले से 'आई लाइक यू' कह दिया लेकिन मेरे सब्र का बांध टूट गया ।मैं फूट-फूटकर खूब रोई जब तक कि मेरी आँखों के आँसू सूख नहीं गए ।
दूसरे दिन मैंने उनसे कहा व्यक्ति जिसे पसंद करता है उसे ही तो प्रेम करता है । जवाब में उन्होंने प्रेम और पसंद पर बुध्द का लंबा-चौड़ा उपदेश दे दिया।
लेकिन मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हो पा रही हूँ।
कहने लगे आप मुझे कंफ्यूज कर रही हैं अपनी बातों से ।
मैं भी तो आपकी बातों से उलझन में पड़ जाती हूँ।
मैंने ऐसा क्या कर दिया ?
आप स्वयं सोच कर देखिए।
कभी कहते हैं कि मुझे 'आई लव यू, बोल देना चाहिए और खुद कहते हैं आई लाइक यू।
आप इन सब बातों को इतना सोचती हैं इसलिए उलझती जाती हैं , इतना सोचने की जरूरत नहीं है खुश रहने की कोशिश कीजिए ।
मैं आपको बहुत खुश देखना चाहता हूँ।
कोशिश तो करती हूँ खुश रहने की लेकिन इस उम्र में इन सब बातों के साथ मन बहुत बेचैन रहता है।
अपने आप को संभालिए सीमा जी आप अकेले रहती हैं। आप की देखभाल करने वाला वहाँ कोई नहीं है ।
जी मैं ठीक हूँ आप अपना ख्याल रखिएगा ।
मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
मैं तो बेटे बहू के साथ रहता हूँ दोनों खूब अच्छे हैं , खूब मेरा ख्याल रखते हैं। मेरे तो साठ के बाद वाले ठाठ हैं.....। आप भी अपने भाई के पास चली जाइए , बच्चों के साथ आपको भी अच्छा लगेगा ।
हाँ ..... सोच तो रही हूँ क्योंकि अब कोरोना भी थोड़ा कम हो गया है । जाना तो पड़ेगा क्योंकि भाई के सिवा तो मेरा कोई है भी नहीं।
" ऐसा मत कहिए ; सीमा जी.. "मैं हूँ ना" ......मैं आपको अपनों में गिनता हूँ। आप को स्वीकार नहीं तो कोई बात नहीं।
स्वीकार तो है, लेकिन आप तो दूर देश बैठे हैं। आप तक तो पहुँचना भी मुश्किल है।
लेकिन मैं तो आपको हमेशा अपने पास महसूस करता हूँ ....।
वह तो मुझे मुझे भी हमेशा महसूस होता है कि आप यहीं आस-पास हैं मेरे ।
फिर क्यों इतना परेशान रहती हैं....?
ठीक है बाबा..... अब नहीं परेशान होंऊँगी। खुश.......।
हाँ ;ये हुई न बात ।गुड...।
ओके, टाटा... बाय ....बाय...।
उनसे बात करते - करते समय का कुछ पता ही नहीं चला। अक्टूबर 2020 में मैं भी भाई के पास चली आई। बच्चों के साथ इनके प्यार के खूबसूरत एहसास से मेरी जिंदगी खुशियों से भर गई थी ।मैं सोच रही थी कि मेरी जिंदगी का इतना अच्छा पल अभी तक कहाँ था ?जीवन के अंतिम पड़ाव में एक ऐसा साथी मिला है जो मुझे चाहता है ,मेरी परवाह करता है,मेरी खुशियों में खुश होता है ।अब मैं इन खुशियों के पल को जी भर कर जीना चाहती थी , एक बार उनसे मिलना चाहती थी, उन्हें जी भर कर देखना चाहती थी ,उनके स्पर्श को महसूस करना चाहती थी, परंतु अपने चाहने से तो कुछ नहीं होता , होता तो वही है जो ईश्वर को मंजूर होता है ।
कोरोना की दूसरी लहर ने मुझे भी अपनी चपेट में ले लिया ।सिर्फ दो दिन के बुखार ने मुझे आईसीयू तक पहुँचा दिया । अस्पताल जाने से पहले बस इनको इतना ही बता पायी थी कि मेरी कोरोना की रिपोर्ट पाॅजटिव आई है, अस्पताल जा रही हूँ शायद कुछ दिन बात न कर पाऊँ ...।
ओके .. टेक केयर .....।मौका लगेगा तो फोन करिएगा....।आपके फोन का इंतजार करूँगा....।
जी जरूर.....।
चार दिन तक बेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत से जूझती रही और प्रार्थना करती रही कि प्रभु मुझे उनके लिए ठीक कर दो, मैं कुछ पल उनके साथ जीना चाहती हूँ, लेकिन मेरी प्रार्थना बेअसर हो गई 29 अप्रैल 2021 की सुबह मेरी आत्मा इस शरीर के खोल से मुक्त हो गई । परंतु मेरी आत्मा इनके लिए छटपटाते रही, कैसे होंगे....? क्या कर रहे होंगे....? मोबाइल में मेरा हाल जानने लगातार मैसेज भेज रहें हैं, लेकिन मैं मैसेज पढ़ने में अपने आप को असमर्थ पा रही हूँ। मेरी मृत्यु को दो दिन हो गये। मेरी आत्मा मोबाइल के आस-पास ही बेचैन घूम रही है। तीसरे दिन उनका फोन आता है ,भाई ने हैलो .....कहा ,तब तक फोन कट गया । पुनः मोबाइल की घंटी बजती है ।हैलो.... सीमा जी से बात हो सकती है क्या...?
आप कौन....?
भाई फफक पड़ा... शायद आपको पता नहीं होगा दो दिन पूर्व ही उनका देहांत हो गया है।
ओह....! यह क्या कह रहे हैं आप.......!
जी मैं सच कह रहा हूँ। कोरोना ने दीदी को भी नहीं बख्शा ......। हमेशा के लिए हम लोग को छोड़ कर चली गयीं ।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें.......। कह कर उन्होंने फोन रख दिया ।
मेरी आत्मा उनके पास पहुँच गई ।मैंने देखा वह फूट-फूट कर रो रहे थे । सीमा तुमने अच्छा नहीं किया, मुझे अकेला छोड़ दिया ।मैं तुम्हें बहुत चाहने लगा था, प्यार भी करता था तुम्हें, लेकिन इस उम्र में इस जिम्मेदारी का बोझ उठा पाऊँगा कि नहीं यही सोच कर कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया ।पर मेरा यकीन मानो मैं कभी तुम्हें खोना नहीं चाहता था ।
काश .....! डॉक्टर साहब! यह बात पहले ही कह दिये होते तो शायद मैं सुकून से मर पाती। क्या आप मुझे सुन पा रहे हैं....? मैं बहुत खुश हूँ कि मुझे इस उम्र में भी कोई इतना प्यार करता है । मत रोइए डॉक्टर साहब मैं यहीं आपके आस-पास ।
डॉ.अनिता सिंह
समीक्षक/उपन्यासकार
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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