मैं और मेरी माँ
मैं और मेरी माँ का रिश्ता अटूट ।
जिसमें नहीं कोई डाल सकता फूट।
माँ की ममता का मीठा अहसास ।
कर जाता मुझे हरदम उदास ।
काश मैं बाँट सकती माँ का दर्द ।
दुखों को उठा लेती बनकर हमदर्द।
समझा पाती सबको उनकी पीड़ा ।
उनके अरमानों को देती कोई दिशा।
उनके चेहरे पर ला सकती खुशियाँ ।
बनकर उनकी अच्छी बिटिया ।
तमन्ना है मेरी हर रात हो उनकी दिवाली ।
हर दिन में हो होली की गुलाली ।
हर शाम हो उनकी सुरमई ।
हर सुबह हो उनकी सतरंगी ।
मैं और मेरी माँ रहते हरदम साथ ।
उनके हाथों में रहता सदैव मेरा हाथ ।
डॉ . अनिता सिंह
रविवार, 10 मई 2020
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
Popular posts
-
मैं तुम्हें मित्रवत चाहती हूँ। तुम्हारे संग हर्षित होती हूँ, तुम्हारे ही संग रोती हूँ। चाहे तुम मुझे उल्लास दो चाहे तुम मुझे विषाद दो य...
-
हौले- -हौले ************ हौले -हौले से मेरे दिल में उतरने लगे तुम। अजनबी होकर भी अपना लगने लगे तुम।...
-
मेरी निंदा करने वाले तेरा अभिनंदन करती हूँ। तेरी ही निंदा से मैं हर पलआगे बढ़ती रहती हूँ। तेरी ही निंदा से मैं आहत भी होती रहती हूँ । तभी...
-
कैसे कहूँ कि तुमसे मुलाकात नहीं होती । हर पल मिलते हैं तुमसे पर दिल की बात नहीं होती। कोई रात ऐसी नहीं जब आँखों से बरसात नहीं होती। कोई...
-
जाने क्या -क्या भूल गयी जाने क्या -क्या याद रखी हूँ। जो कुछ भी लिखा है मैने सब तुमसे मिलने के बाद लिखी हूँ। कुछ भूली -बिसरी यादें थीं ...
-
ऐ दर्पण! लोग कहते हैं कि तू झूठ नहीं बोलता। लेकिन तुम केवल अर्धसत्य हो। कयोंकि तुम तो सिर्फ तन को प्रतिबिम्बित करते हो। मन को नहीं । ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें