याद आता है बचपन का छोटा सा आँगन ।म
भाई -बहन का संग स्नेह में डूबा मन।
माँ की सीख व पिता का अनुशासन।
रिमझिम फुहार में भिगोता था सावन।
सोंधी सुगंध लिए मिट्टी की खुशबू।
आम का बगीचा व कोयल की कू -कू।
दिन भर धमा चौकड़ी संध्या थकान की।
सूरज है लाली लिए आए प्रभात की ।
उपलों की आँच में पकी हुई दाल ।
अनुपम सुगंध लिए पकता था भात।
कंडे के ढेर पर पकी हुई लिट्टी।
बैंगन का भर्ता ,सिलबट्टे की चटनी।
पूनम के चाँद - सी मक्के की रोटी ।
महुआ की मिठास है अभी भी डुबोती ।
गुड़ -बताशा संग लोटा भर पानी ।
अतिथि का आगमन माँ की अगवानी।
मेरा बचपन बसता है अभी भी उसी गाँव में ।
कुएँ के पानी और आम-जामुन की छाँव में ।
वर्षा के जल से लबालब तालाब में ।
मेंढक की टर्र-टर्र व झींगुर अवाज में ।
तारों भरे थाल की मोती की टिम-टिम में।
आधी रात गुजरती रेलगाड़ी की छुक-छुक में ।
बाबा के रामायण और मइया की कजरी में ।
धर्म ग्रंथो की शक्ति व गीता की भक्ति में ।
दोनो की आस्था देवालय की ज्योति में ।
शंख की गूंज और आरती की घंटी में ।
छोटा -सा गाँव जो नदी के किनारे में।
लेते थे आनंद हम रिमझिम फुहारों में ।
सब कुछ बदल गया आधुनिकता की आड़ में ।
नदी भी सूख गयी स्वच्छता के अभाव में ।
अब कजरी न चैती न फाग मधुमास में ।
नहीं जीते लोग अब मेहमानी उल्लास में ।
गन्ने का छौंका न गुड़ की मिठास अब ।
महुआ की खुशबू न करे बेकरार अब ।
सरसों के साग संग मक्के की रोटी ।
कहाँ बन पाएगी आज की बेटी ?
सब कुछ मिलता है आधुनिक बाजार में
बीत जाता है बचपन स्नेह के अभाव में।
डॉ.अनिता सिंह
उपन्यासकार/समीक्षक
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें