शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

बचपन

बचपन

याद आता है बचपन का छोटा सा आँगन ।म
भाई -बहन का संग स्नेह में डूबा मन।

 माँ की सीख व पिता का अनुशासन।
 रिमझिम फुहार में भिगोता था सावन।

 सोंधी सुगंध लिए मिट्टी की खुशबू।
 आम का बगीचा व कोयल की कू -कू।

 दिन भर धमा चौकड़ी संध्या थकान की।
 सूरज है लाली लिए आए प्रभात की ।

उपलों की आँच में पकी हुई दाल ।
अनुपम सुगंध लिए पकता था भात।

 कंडे के ढेर पर पकी हुई लिट्टी।
 बैंगन का भर्ता ,सिलबट्टे की चटनी।

 पूनम के चाँद - सी मक्के की रोटी ।
महुआ की मिठास है अभी भी डुबोती ।

 गुड़ -बताशा संग लोटा भर पानी ।
अतिथि का आगमन माँ की अगवानी।

मेरा बचपन बसता है अभी भी उसी गाँव में ।
कुएँ के पानी और आम-जामुन की छाँव में ।

वर्षा के जल से लबालब तालाब में ।
मेंढक की टर्र-टर्र व झींगुर अवाज में ।

तारों भरे थाल की मोती की टिम-टिम में।
आधी रात गुजरती रेलगाड़ी की छुक-छुक में ।

बाबा के रामायण और मइया की कजरी में ।
धर्म ग्रंथो की शक्ति व गीता की भक्ति में ।

दोनो की आस्था देवालय की ज्योति में ।
शंख की गूंज और आरती की घंटी में ।

छोटा -सा गाँव जो नदी के किनारे में।
लेते थे आनंद हम रिमझिम फुहारों में ।

सब कुछ बदल गया आधुनिकता की आड़ में ।
नदी भी सूख गयी स्वच्छता के अभाव में ।

अब कजरी न चैती न फाग मधुमास में ।
नहीं जीते लोग अब मेहमानी उल्लास में ।

गन्ने का छौंका न गुड़ की मिठास अब ।
महुआ की खुशबू न करे बेकरार अब ।

सरसों के साग संग मक्के की रोटी ।
कहाँ बन पाएगी आज की बेटी ?

सब कुछ मिलता है आधुनिक बाजार में 
बीत जाता है बचपन स्नेह के अभाव में।

डॉ.अनिता सिंह 
उपन्यासकार/समीक्षक 

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