हे मेरे कृष्णा!
कब मैं तेरी राधा बन गयी
मुझे पता ही नहीं चला ।
कब तेरी बंशी की धुन
मेरे हृदय में उतर गयी
जान ही नही पायी ।
कब तेरी मीठी मुस्कान
मेरे हृदय की धड़कनो में समा गयी ।
कब तेरी कमल नयनों का जादू
मुझ पर चल गया पता ही नहीं चला ।
कितना कठिन है राधा बनना,
राधा बनकर तेरे प्रेम में तड़पना
और तेरा मुस्कराकर चले जाना।
यह जानते हुए भी कि
तुम किसी और के अमानत हो ।
मेरे कभी नहीं बन सकते
फिर भी टूटकर तुम्हे चाहना ।
आजीवन तेरी चाहत में
तड़पना और आँसू बहाना ।
अब समझ आया
क्यों हर स्त्री सीता बनना चाहती है।
सीता की तरह पतिब्रता बनकर
जीना आसान है ।
राधा बनकर कृष्णा तेरे
प्रेम के विरह में जलना
तो सिर्फ राधा ही जान सकती है।
मैने तो तुम्हे दिल से चाहा था कृष्णा
हर जन्म में चाहती रहूँंगी.........।
तेरे साथ बिताए सुखद पलों
को दिल से संजोती हूँ ।
तुम्हारे हाथों के स्पर्श ने
मेरे आत्मा के एकांत क्षणों में
अपने वश में कर लिया है और
मेरे हृदय में मीठास की जो
मदिरा उडे़ल दी है ...........
उसी के साथ हर युग में
राधा बनकर जीती रहूँगी ।
तुम्हारे लौटने के इंतजार में
कृष्णा ...........................??
डॉ.अनिता सिंह
बुधवार, 29 नवंबर 2017
“कृष्णा "
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